खुबसूरत कविता

खुबसूरत कविता

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तिनके के सहारे दरिया पार करने निकला था,
लहरों ने डूबा दिया मुझे
कश्ती जिनकी थी वो पार हो निकले
समंदर ने अपना लिया मुझे

 

बरसात हुई नदी भर गये
समंदर आज भी वहीं हैं
आग लगी जंगल जल गये
जानवर आज भी वहीं हैं

 

पानी बेरंग था लहरों ने रंग दिया उसे
जमाना हमारा भी था वक्त ने छीन लिया उसे
मुझे मेरे कातिल का पता था
पर ईश्क ने माफ किया उसे

 

फिर आएँगे प्यार के कुछ किस्से
दिख जाएंगे टूटे दिल के हिस्से
जमाने से चलता आया है ये रिवाज ईश्क का
पैसा जिसका मोहब्बत उसका

 

दरिया में बहा दूँ या फिर आग में जला दूँ
मैं अपने इस गरीबी को किस मिट्टी में दबा दूँ
चिखता हूँ चुप हो के अब
कैसे अपनी इस आवाज़ को उस खुदा तक पहुंचा दूँ

 

-अभिषेक कुमार भारद्वाज

छात्र , USIT

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