अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कब आयेंगे अच्छे दिन

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कब आयेंगे अच्छे दिन

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सरकार प्रभात (प्रभात रंजन मिश्र )

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कब आयेंगे अच्छे दिन

अच्छे दिन आने वाले है

ये नारा चाहे कही असफल हो या ना हो लेकिन abvp के लिए तोह पूर्ण रूप से असफल हो गया है

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के लिए समय बिलकुल अनुकूल नही चल रहा है इनके बुरे दिन आ गये है | बुरे दिनों की शुरुआत राजस्थान विश्वविद्यालय के चुनावो से हुई और ये थमने का नाम ही नही ले रही है | राजस्थान में जहा आम आदमी पार्टी की की छात्र यूनिट ने abvp को पटकनी दी | वही दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में कांग्रेस की छात्र यूनिट इनपे भारी पढ़ गई | हालांकि जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में परिणाम इतने बुरे नही रहे लेकिन जीत का स्वाद तोह्ह abvp को वहा भी चखने को नही मिला और अभी हाल में ही abvp को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में समाजवादी पार्टी की छात्र यूनिट ने पटखनी दे दी है |

 

हार एक बार भूल की वजह से मानी जा सकती है दूसरी बार गलत आकलन की वजह से तोह्ह तीसरी बार शायद परिस्तिथि अनुकूल ना हो लेकिन चोथी हार तोह्ह शायद खेल में आप काफी कमजोर हो गये इसी वजह से हो सकती है |

यही शायद abvp के साथ हुआ पहली हार जोकि राजस्थान छात्र संघ चुनाव में cyss द्वारा मिली उसे भूल कहा जा सकता है | आप की छात्र यूनिट को कमजोर आकना राजस्थान यूनिवर्सिटी में abvp की भूल थी जिसका परिणाम उन्हें हार कर चुकाना पड़ा |

राजस्थान छात्र संघ चुनाव में जहा abvp को  सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उन्ही के बागी विद्यार्थी निर्दालिये अध्यक्ष पद का चुनाव जीत गए | पवन यादव ने abvp के उम्मीदवार संजय को 2656 वोटो के बड़े अंतर से हराया | abvp को इस चुनाव में उपाध्यक्ष और महासचिव का भी पद हारना पड़ा |

वही कॉलेजो में cyss बाजी मार गई कुल 83 कैंडिडेट को चुनाव में लडवा कर 46 सीटो पर चुनाव जीत का एक जबरदस्त एंट्री मारी

abvp की दूसरी हार शायद गलत आकलन था और हार का स्वाद छाख्या धुर विरोधी वामपंथी विचारधारा के विद्यार्थियो ने जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के छत्र संघ चुनाव में |

भर पुर रूप से की गई तैयारिया यूनिवर्सिटी में दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग भाड़े गये यूनिवर्सिटी को काफी विवादित मुद्दों से घेरा भी गया वात्सप्प यूनिवर्सिटी में बोहत सरे फेक सन्देश भी भेजे गये लेकिन यहाँ भी abvp को लेफ्ट के गठबंधन के हाथो मुह की खानी पड़ी और 4 की 4 सीटो पे abvp हार गई |

यह चुनाव इस लिहाज से भी ख़ास रहा की की इसमें भाजपा के बड़े नेता भी सम्मलित रहे यहाँ तक की कैलाश विजयवर्गीय ने तोह नतीजो से पहले ही abvp को चुनाव जीतने की बधाई दे दी | इसे उन्होंने राष्टवाद की जीत बताया था तोह महामंत्री जी क्या हार को राष्ट्रवाद की हार मान ली जाये |

jnusu का चुनाव बोहत लहजे से ख़ास रहता है पिछले कुछ वर्षो से इस यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी और मोदी सरकार के बीच तनातनी बनी हुई है | यहाँ सीधा टकराव वामपंथ विचारधारा और दक्षिणपंथी विचारधारा के बीच होता है | इस बार चुनाव में पदाधिकारियो को चुनने के लिए चार स्कूलों में मतदान केंद्र बनया गया था | मतदान केंद्र के बहार ढपली, ढोल, और शंख की आवाजो के बीच कुल 58.69 फीसदी मतदान हुआ था जिसमे अध्यक्ष पद पर बाजी मार ली गई aisa की गीता कुमारी द्वारा |

गौरतलब है की abvp jnusu के चुनाव में अपना ख़राब प्रधार्शन नही मानता और मानना भी नहीं चाहिया पिछले साल के मुकाबले उनका परिणाम अच्छा रहा लेकिन जनाब जीत का स्वाद तोह आपको यहाँ चखने को भी नही मिला

abvp को तीसरी और सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा दिल्ली यूनिवर्सिटी छत्र संघ चुनाव में जहा चार साल बाद उन्हें अध्यक्ष पद की कुर्सी गवानी पड़ी | इस चुनाव में हार का कारण शायद परिस्तिथि का अनुकूल होना ना था ये आप कह सकते है पिछले 4 सालो से गद्दी पर विराजमान होने के बाद शायद लग रहा होगा की हमें कोई चुनाव हरा ही नही सकता और यही आत्मविश्वास abvp ले डूबा और इस इलेक्शन में nsui की गालब वापसी हुई | हवा तोह्ह सिल्ली यूनिवर्सिटी की वैसे ही abvp की खिलाफ थी कई लोगो ने गुंडागर्दी का आरोप लगाया तोह कई लोगो ने कैंपस में अशांति फ़ैलाने का | गुरमेहर कौर के स्टेटमेंट के बाद आई हुई प्रतिक्रिया तोह abvp को याद होगी ही | और रही कही कसर वात्सप्प यूनिवर्सिटी पर वायरल हुए फेक संदेशो ने पूरी कर दी |

दिल्ली यूनिवर्सिटी का चुनाव एक बड़ा चुनाव माना जाता है वजह ये है की एक तोह्ह ये राजधानी और दूसरी इस यूनिवर्सिटी में पुरे देश के बच्चे आके शिक्षा ग्रहण करते है इस साल कुल 1.32 लाख छात्रो ने मतदान किआ था | चुनाव के परिणाम ये रहे की nsui अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पर कायम हुई और abvp को सचिव और सहसचिव के पद से संतोष करना पड़ा |

abvp को शायद खेल में सुधर की जरुरत हे इसका अंदाजा अब तक लग चूका था लेकिन अपनी गलतियो से ना सीखना शायद छत्र राजनीति की प्रविर्ती है और उसका परिणाम देखने को मिला इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव के नतीजो से जहा प्रदेश में प्रचंड बहुमत की भाजपा सरकार है वहा इलाहाबाद जो शायद कुछ समय बाद प्रयागराज हो जाएगा वहा के छात्रसंघ के चुनाव में भी abvp अपनी लाज ना बचा पाई | यहाँ abvp को धुल चटाई समजवादी पार्टी के छात्र यूनिट ने |

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुन्नव में समाजवादी छात्रसभा ने परचम लहरा दिया | छात्रसभा के पैनल में उतरे 5 में से 4 पर समाजवादी प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई वही abvp को मात्र एक महामंत्री के पद से संतोष करना पड़ा | इस चुनाव में बड़ी बात ये रही की अध्यक्ष पर तीसरे पद पर abvp कैंडिडेट रहे |

विश्लेषण

इस हार के दो  मायने देखे जा सकते है | अगर बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और राजस्थान यूनिवर्सिटी की की जाये तोह दोनों प्रदेशो में अभी भाजपा काबिज है और वह हुई हार को विरोधी सर्कार की ह्हार की रूप में अंक सकते है | हालांकि ये भी मानना  रहा है की छात्र राजनीति का राष्ट्रीय राजनीति पर कोई प्रभाव नही होता यहाँ चुनाव के मुद्दे अलग होते है लेकिन राजनितिक पार्टिया इसे राष्ट्रीय राजनीति बनाने में भी तोह कोई कसर नही छोड़ते |

राजस्थान यूनिवर्सिटी के चनावो की बात की जाये तोह वह abvp ने कई कोलेज के प्रेसिडेंट पद पर अपना परचम लहराया है और दिल्ली यूनिवर्सिटी में दो पदों पर jnusu में सभी पदों पर वह द्वित्य स्थान पर रही है और वाम मोर्चे को गठबंधन बनाने पर मजबूर कर दिया |

कहते हे हार के जीतने वाले को ही बाजीगर कहते है यही इन हारो से पर्याय भी निकलता है क्युकी स्टूडेंट्स के बिच में ये सन्देश जा चूका है की abvp हार चुकी है और अगले चनावो में वो रूलिंग नेताओ का विरोध कर चुनाव में उतरेगी जिस से उसकी राह काफी आसन हो जाएगी | अब बाकि छत्र यूनिट को अगर abvp को फोर हराना है तोह उन्हें abvp की हार की जीत वाले शस्त्र का तोड़ ढूँढना पडेगा |

बाकि छात्र राजनीति को छात्र राजनीति की तरह ही ले

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