गुज़रती रहीं इक नज़र दूर तक है

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गुज़रती रहीं इक नज़र दूर तक है
नज़र में नज़र का असर दूर तक है।

चले हम चले तुम चले ज़िन्दगी भी
सुनो ज़िन्दगी का सफ़र दूर तक है।

चुने इक डगर हम क़दम साथ रखकर
ठहरती नही यह डगर दूर तक है।

अंधेरों का दामन सुनो छोड़ देना
उजाला लिए अब सहर दूर तक है।

संवरने लगें हैं सनम ख्वाब मेंरे
मुहब्बत में दिल की बसर दूर तक है।
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नीता सक्सेना 
स्वारचित मौलिक रचना 

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