शीर्षक की दैनिक विजेता दिनांक 12 अक्टूबर

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इश्क का इज्तिराब है शायद
आँख में नम सा ख्वाब है शायद

कुछ तो काँटें हैं साथ खुशबू के
जिन्दगी इक गुलाब है शायद

इसकी आमद से खिल उठे रंगत
इश्क ये लाजवाब है शायद

तुमने भेजा नहीं कभी जिसको
मेरे खत का जवाब है शायद

दिल में रखता नहीं है वो कुछ भी
इक खुली वो किताब है शायद

कल का कुछ है पता नहीं जिसको
आदमी इक हुबाब है शायद

दोस्त गुजरें न मेरी गलियों से
वक्त मेरा खराब है शायद !!

मंजुल निगम
स्वरचित

 

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