कठपुतली

0
147
“मनु ,ये चाय अपनी दादी को दे आ”, खेलती हुई मनु से सुमन ने कहा।
मनु से चाय भिजवा कर सुमन ने एक तरफ सास के लिए  खिचड़ी कुकर में चढ़ाई और दूसरी तरफ दोपहर के खाने की तैयारी करने लगी।
विगत कई दिनों से सास की तबियत खराब चल रही थी और उनको देखने के लिए मेहमानो के आने जाने का क्रम भी चल रहा था ।
सास की तीमारदारी और मेहमानों की खातिरदारी करती सुमन दिन भर एक पैर पर खड़ी रहती । मगर उसकी कर्कशा सास बिस्तर पर बैठी -बैठी भी कुछ न कुछ कमियां निकालती ही रहती थी , और तानें कसती रहती थी।
सुमन भी कब तक सुनती रहती कभी कभी वो भी चिढ कर जबाब दे देती थी ।
सुमन रसोई में ख़ड़ी यही सब सोच रही थी क़ि इतने में सास के चिल्लाने की आवाज आई ,” अभी तक कपडे नहीं धुले ! मनु तेरी माँ सारा दिन करती क्या रहती है आखिर?!”
सुमन उनको जवाब देने ही वाली थी कि उसका छोटा बेटा उसके पास आकर बोला, ” मम्मी, देखो प्रज्ञा मामी ने कितना अच्छा मेसेज किया है व्हाट्सएप्प पर, अगर  कोई व्यक्ति आपको बार -बार गुस्सा दिलाने में सफल हो जाता है तो इसका मतलब है कि आप उसके हाथ की कठपुतली बन गए हैं”।
जवाब देने के लिए खुला सुमन का मुँह बंद हो गया, और वो गुनगुनाती हुई अपना काम करने लगी।

मेघा राठी 

भोपाल मध्य प्रदेश 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here