मन रे भज हरि-पद-कमल।

मन रे भज हरि-पद-कमल।

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मन रे भज हरि-पद-कमल।
जिन चरनों की महिमा न्यारी,
पद-रज ने कितनों को तारी।

शीतल,सुखद अमल।।मन रे!

हरि-पद पूजे चित सँवरत है,
नयनों में नव ज्योति जरत है।

होते दुख दूर सकल।।मन रे!

बस जाये जो छवि नयनों में।
मंगल हो तन-मन वचनों में।।

छोड़ जगत की अति हल-चल।।मन रे!

अब तक तूने बहुत गँवाया।
खुद सोचो क्या तूनें पाया।।

छूट न जाये अगला भी पल।।मन रे!

मदनमोहन पाण्डेय
स्वरचित

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