सभी अपनी-अपनी प्रशंसा कर रहे थे।

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स्वाद अधिवेशन में वाद-विवाद प्रतियोगिता चल रही थी। सभी अपनी-अपनी प्रशंसा कर रहे थे।

मिठाई अपनी प्रशंसा में फूली नहीं समा रही थी, “मुझे हर जगह लोग पसन्द करते हैं, यहां तक कि मंदिर की पूजा भी मेरे बिना पूरी नहीं होती। शादी-ब्याह, त्योहार यहां तक कि छप्पन भोग भी मेरे बिना अधूरे हैं।”

करेला बोला, “हां हां, तुम्हारी मिठास ने ही तो दुनिया में तबाही मचा रखी है। मधुमेह से पीड़ित लोग मेरी तरफ़ दौड़े चले आ रहे हैं।”

आंवला बोला, “कसैला हूं तो क्या हुआ?रोगों को जड़ से मिटाने की ताकत रखता हूं।”

नमक भी पीछे क्यों रहता, “जनाब, मेरी तरफ़ भी तो देखो। मैं नहीं तो भोजन में मज़ा ही नहीं।”

“जा जा, ब्लडप्रेशर बढ़ाने वाला है तू। मुझे देख,फलों का राजा हूं मैं।कच्चा रह कर अचार की खटास में और पक कर मिठास से भर जाता हूं।है कोई मुझ जैसा खट्टा-मीठा?” आम ने अपनी शेखी बघारी।

जज महोदय निर्णय सुनाने ही वाले थे कि नन्हीं सी जिह्वा उठ खड़ी हुई और बोली, “जज महोदय,ज़रा मेरे वक्तव्य पर भी गौर फ़रमायें।माना कि फलों का राजा आम खट्टा-मीठा स्वाद देता है पर खाने वालों को मज़ा तो मैं ही देती हूं।मेरे बिना यह खट्टा-मीठा किस काम का?”

जज साहब ने जिह्वा को ‘स्वाद की रानी’ घोषित करते हुए पुरस्कृत किया।

शील निगम 

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