भारत में अपराध : भारतीयों का अपराध।⁠⁠⁠⁠

आज के भारत में अपराध एक ज्वलंत समस्या है! विश्व का प्रत्येक समाज एक अपराध-मुक्त, शांत प्रदेश में रहने का इच्छुक होता है! यदि किसी प्रदेश की सरकार उस समाज को भय-मुक्त, अपराध-मुक्त वातावरण नही प्रदान कर पाती तो उस सरकार को नकारा करार दिया जाता है! एक सभ्य समाज को प्रगति करने के लिए शांत वातावरण की आवश्यकता होती है! भारत में बढ़ते हुए अपराध की समस्या ने देश की तरक्की को काफ़ी हद तक बाधित किया है! देश में अपराध की बढ़ती हुई समस्या को समझने से पहले हमें अपराध की अवधारणा को समझना होगा! अपराध के सामाजिक सन्दर्भ के कारण उसे अवधारणात्मक रूप से परिभाषित करना कठिन है ! प्रसिद्ध अंग्रेजी इतिहासकार और उपन्यासकार जेम्स एंथोनी फ्राउड ने कहा कि “अपराध को भगवान के खिलाफ अपराध के रूप में दंडित नहीं किया जाता है, बल्कि इसका समाज के लिए प्रतिकूल होना इसे दंडनीय बनाता है”। एक कर्म अपराध की श्रेणी में तभी आता है जब वह एक निश्चित रेखा को पार करता है, और यह निश्चित रेखा समाज के शक्तिशाली वर्ग (शासक वर्ग) द्वारा बनाई जाती है! भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार एक कर्म जो कोड (आईपीसी) द्वारा दंडनीय हो अपराध कहलाता है! ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी के अनुसार अपराध वह कर्म है जो व्यक्ति या राज्य के खिलाफ किया जाए और जो कानून द्वारा दंडनीय है। यहाँ क़ानून द्वारा दंडनीय शब्द को समझने की आवश्यकता है! विभिन्न क्षेत्रों में एक ही कर्म को अलग अलग तरीके से निर्धारित किया जाता है! यह निर्धारण उस प्रदेश में प्रचलित क़ानून व्यवस्था से होता है ! उदाहरण के लिए, व्यभिचार भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत एक अपराधिक गतिविधि है, जबकि यह संयुक्त राज्य अमेरिका में अपराध नहीं है। इंग्लैंड में, यह एक नागरिक असभ्यता मात्र ही है! भारत के खाने के संदर्भ में बीफ़ खाना एक आपराधिक गतिविधि है जो अलग-अलग राज्यों में दंडनीय अपराध है! जिन राज्यो में बीफ खाने पर रोक लगी है, यदि आप उस राज्य में बीफ का इस्तेमाल करते पकड़े गये तो जेल और जुर्माना दोनो देना पड़ सकता है! मदिरापान भारत में कभी भी एक दंडनीय अपराध नही रहा परंतु गत् कुछ वर्षो में गुजरात, बिहार, नागालैंड आदि राज्यो में शराब पर पूर्णतः रोक लगा दी गयी है! अब यदि उपर्युक्त राज्यों में कोई व्यक्ति शराब पीता हुआ पकड़ा जाता है तो उसे दंड दिया जाएगा!

इस प्रकार हम समझ सकते हैं की एक कर्म अपने आप में अपराध नही है जब तक उसे कुछ नियमो द्वारा बाँध नही दिया जाता! एक शांत और सभ्य समाज के निर्माण हेतु कुछ विशेष नियमों का निर्धारण होता है और जो व्यक्ति उन नियमों का उलंघन करता है उसे अपराधी घोषित किया जाता है! एक कर्म समय तथा स्थान के अनुसार अपराध में तब्दील हो सकता है और उस कर्म को करने वाला एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपराधी माना जा सकता है!

 

अपराध के प्रकार

भारत में अपराधों का संकलन, गणना तथा विश्लेषण राष्ट्रीय संस्था,  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा किया जाता है ! मुख्यतः अपराध को दो भागो में बाँटा गया है – संज्ञेय तथा असंज्ञेय! संज्ञेय  अपराध के अंतर्गत पुलिस बिना किसी वॉरेंट के मुलजिम को पकड़ सकती है परंतु असंज्ञेय अपराध में मजिस्ट्रेट का आदेशा आवश्यक है !

अपराध के कारणों को जानने से पहले भारत में बढ़ते हुए अपराध की वर्तमान स्तिथि को समझ लेना आवश्यक है।

भारत में अपराध

भारत के विभिन्न राज्यों में अपराध का वितरण अत्यंत आसमान है। कुछ राज्यों में अपराध की स्तिथि अत्यंत भयावह है, वहीं कुछ राज्य लगभग अपराध-शून्य हैं। यदि हम अपराध के आंकड़ों का अध्यन करें तो पाएंगे महानगरों में अपराध के मामले अन्य प्रदेशों से कहीं अधिक हैं। वर्ष 2015 में संज्ञेय अपराधों के कुल संख्या 7326099 पंजीकृत की गई। कुल भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आने वाले हिंसात्मक अपराधों का हिस्सा 11.4% रहा जबकि वर्ष 2014 में यह 11.6% था। हिंसात्मक अपराधों की सर्वाधिक दर दिल्ली (97.4) से दर्ज की गई। उसके बाद असम (47.1), अरुणाचल प्रदेश (39.9) और हरियाणा (37.5) आते हैं।

‘अपराध दर’ विभिन्न राज्यों / संघ शासित प्रदेशों के बीच अपराध की तुलना करने के लिए एक मानक मानदंड है। अपराध दर को प्रति/लाख आबादी पर सूचीबद्ध अपराध की कुल संख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह एक सार्वभौमिक संकेतक है जो विभिन्न जनसंख्या और आकार वाले क्षेत्रों में अपराध के तुलनात्मक विश्लेषण के लिए उपयोग किया जाता है।

यदि अपराधों की कुल संख्या के आधार पर देखा जाए तो वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक आपराधिक मामले (40613 मामले) दर्ज किये गए जो कि कुल दर्ज हुए मामलों का 12.1% है। दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र आता है जहाँ कुल 37290 मामले दर्ज हुए और तीसरे स्थान पर 35754 मामलों के साथ बिहार है। हत्या के अपराध में भी उत्तर प्रथम स्थान पर है। सभी हत्याओं के मामले में निजी दुश्मनी, हत्या का सबसे बड़ा कारण रहा। हत्या का दूसरा सबसे बड़ा कारण सम्पति विवाद है।

महिलाओं के प्रति अपराध के मामलों में  वर्ष 2014 की तुलना में कमी आयी है। वर्ष 2014 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 3,37,922 मामले दर्ज किए गए थे तथा अपराध दर 56.3  दर्ज हुई। वर्ष 2015 में कुल अपराध के 3,27,394 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 53.9 दर्ज की गई। यद्यपि यह कमी स्वागत योग्य है, परंतु महिलाओं के प्रति अपराध की संख्या अत्यधिक है।

महिलाओं के प्रति अपराध के अधिकांश मामलों में ‘पति अथवा उसके रिश्तेदारों द्वारा  क्रूरता’ (34.6%) के मामले दर्ज किए गए, उसके बाद दूसरे स्थान पर ‘महिला की अस्मिता भंग करने के लिए किया गया हमला’ (25.2%) के मामले दर्ज किए गए, जबकि अपहरण के 18.% मामले और बलात्कार के 10.6% मामले दर्ज किए गए। मीडिया द्वारा रचित आपराधिक वातावरण के अनुसार आम भारतीय के मानसपटल यही रहता है कि बलात्कार के अपराध महिलाओं के खिलाफ अन्य अपराधों से बढ़कर हैं, परन्तु वास्तविक स्तिथि अधिक भिन्न है। पूरे भारत मे बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले मध्य प्रदेश से जुड़े हैं जहाँ पूरे भारत के 12.7% (4391 मामले) बलात्कार के मामले दर्ज हुए। उसके बाद में महाराष्ट्र 12% मामले दर्ज हुए। प्रति लाख महिलाओं पर सर्वाधिक अपराध दर्ज दिल्ली में 23.7 दर्ज हुई। जबकि राष्ट्रीय औसत 5.7 है।

वर्ष 2015 के बलात्कार के कुल 34,651 मामलों में 33,098 (95.5%) मामले ऐसे थे जिनमें बलात्कारी पीड़िता का परिचित था। अन्य भयावह चित्र अनाचार (कौटुम्बिक) बलात्कार के 556 मामले दर्शाते हैं जिनमें 54.5% मामलों में पीड़ित बच्चे की उम्र 18 वर्ष से भी कम आयु की थी। इस प्रकार के बढ़ते आपराधिक मामले समाज में व्यक्ति की कलुषित होती हुई मानसिकता को दर्शाते हैं। जब बच्चा अपने परिवार में ही व्यभिचार का शिकार बनने लगा है तो उसे सुरक्षित माहौल कहाँ मिलेगा?

संपत्ति से जुड़े मामलों में राजस्थान 13.7% मामलों के साथ प्रथम स्थान पर अवस्थित है, उसके बाद चंडीगढ़ (11.5%), और दमन व दिउ आते हैं। चोरी से जुड़े मामलों में दिल्ली (22.3%) प्रथम स्थान पर है जबकि धोखाधड़ी के मामलों में राजस्थान का स्थान सबसे ऊपर आता है।

अपराध के कारण

यद्दपि अपराध के कारणों पर अत्यधिक शोध हुआ है, परंतु कुछ निश्चित कारको को अपराध के लिए दोषी मानने में विद्वानों में एकमत रूप से सहमति नही दी गयी है।

जहाँ एक तरफ विद्वानों ने कुछ सिद्धान्तों को प्रस्तुत कर अपराध के कारणों का विश्लेषण करने की कोशिश की है, वहीं विभिन वर्गों से आये अपराधियो ने और उनके अपराध में संलिप्तता के उद्देश्यों ने इन सिद्धान्तों को गलत ठहराया है। मनुष्य सर्वाधिक अपूर्वानुमेय है। मनुष्य के व्यवहार का पूर्वानुमान लगाना अत्यधिक कठिन रहा है। यह इसलिए भी है कि हमारा व्यवहार विभिन्न कारणों से एक साथ भिन्न-भिन्न मात्रा में, समय व स्थान के अनुसार प्रभावित होता है और यह प्रभाव एक ही मनुष्य पर भिन्नता के साथ क्रिया करता है।

फिर भी अपराध के कारणों को समझने के लिए हम कुछ कारको का विश्लेषण कर सकते हैं।

  1. अपराध के सामाजिक कारण

अपराध के कई सामाजिक कारण हैं ये सामाजिक कारण सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से आपराधिक कृत्य के पीछे के कारण होते हैं। समाजीकरण प्रभावकारी कारक के रूप में कार्य करता है। बचपन से वयस्कता के विकास के दौरान कुछ लोगों का सामना करना पड़ता है। यह नकारात्मक सामाजिक वातावरण कुछ लोगों की मानसिकता को बदल देता है जिससे वे आक्रामक और अपमानजनक बनते हैं। आपराधिक व्यवहार में शामिल होना उनके लिए नियमित होता है। कुछ सामाजिक कारण हैं: बाल दुर्व्यवहार; पति का दुर्व्यवहार; परिवार में झगड़े और क्लेश; माता-पिता की लापरवाही; टूटे हुआ घर; दहेज मौतें; द्विविवाह; महिला भ्रूण हत्या; बेटे और बेटियों के बीच असमानता; शराब; नारकोटिक ड्रग्स; दोषपूर्ण शिक्षा; जातिवाद; सफेद कॉलर अपराध, और बेरोजगारी, आदि !

  1. अपराध के आर्थिक कारण

अधिकांश अपराधों के केंद्र में धन है। गरीबी धन की अनुपस्थिति है। गरीबी मानव समाज के लिए एक अभिशाप है। कुछ लोगों को आय का उचित स्रोत नहीं मिल रहा है और शॉर्टकट और अमीर होने के लिए आपराधिक पथ की ओर अग्रसर हो जाते हैं। कभी-कभी आवश्यकताएं पूरी न होने की हताशा आपराधिक व्यवसाय की ओर ले जाता है। अवैध धंधों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी विभिन्न प्रकार के अपराधों की उत्पत्ति का कारण है। कुछ आर्थिक कारण प्रमुख हैं जैसे गरीबी; अधिक जनसंख्या; बेरोजगारी; सफेद कॉलर अपराध; औद्योगिकीकरण और शहरीकरण; वेश्यावृत्ति; खराब सरकारी नीतियां; जेल।

  1. मानसिक असामानता अपराध का कारण

मानसिक असामानता सही और गलत के बारे में विवेक का अभाव है। मानसिक बीमारी से पीड़ित लोग  दुर्व्यवहार के आसानी से शिकार बन जाते हैं। वे सामाजिक मानकों के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण के साथ जवाब देने में असमर्थ हैं। समाज द्वारा निर्धारित औपचारिक मार्ग से विचलन उन्हें एक अपराधी बना जाता है। मानसिक असामानता के कुछ कारण हैं जैसे: असामान्यता; मानसिक कमी; असामाजिक लोग आदि।

  1. अपराध के राजनीतिक कारण

राजनीति सभी के बारे में है जो देश को मानता है। किसी देश को संचालित करने वाले लोग राजनेता हैं सत्ता के शीर्ष पर होने और राजनीतिक मशीनरी के नियंत्रक होने के नाते ये राजनेता विभिन्न अवैध गतिविधियों में शामिल होने के डर के बिना संलग्न होते हैं क्योंकि वे सभी विभागों को अपने नियंत्रण में रखते हैं।  शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार एक अनचाहा प्रभाव है जो समाज की सामाजिक-राजनीतिक पारदर्शिता को मारता है। सरकारों द्वारा ईमानदार गतिविधियों में अस्पष्टता की सर्वव्यापतता विभिन्न अपराधों की ओर ले जाता है कुछ राजनीतिक कारण हैं जैसे : भ्रष्टाचार; भ्रष्ट राजनेता; धर्म बनाम राजनेता; असमानता आदि!

अपराध को कम करने के सुझाव

अपराध को एक गंभीर बीमारी के रूप में लेने की आवश्यकता है और जिस प्रकार सरकार स्वास्थ्य के उपागमों पर ध्यान केंद्रित करती है कुछ उसी प्रकार के विशेष कदम अपराध को रोकने के लिए उठाने की आवश्यकता है। विभिन्न क्षेत्रों के लोगो को एक साथ व्यवस्थित करने की आवश्यकता है जो एक ऐसा वातावरण उत्पन्न करें जिसमे सुरक्षा और आपसी सद्भाव प्रकट हो। ऐसा करने पर अपराध भी कम होंगे और अपराध का भय भी कम होगा। जिन भी स्थानों पर अधिक अपराध होते हैं, उनमे बदलाव लाने की आवश्यकता है। अपराधी को पकड़ने पर अधिक ध्यान देने से ज्यादा उपयुक्त होगा, अपराध को होने से रोकने पर बल देना। सामाजिक मूल्यों में होते निरंतर ह्रास को  उचित मार्गदर्शन देने की आवश्यकता है। भौतिक आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को नए युवा अपने मस्तिष्क पर हावी न होने दें और मानवीय मूल्यों को अधिकाधिक स्वीकार कर सके ऐसे वातावरण को बनाने की आवश्यकता है। एक व्यवस्थित, एकीकृत, समन्वित दृष्टिकोण जो राज्य और गैर-राज्य अभिनेताओं की विस्तृत जिम्मेदारियों को राष्ट्रहित में संजोये। राष्ट्रीय स्तर पर अपराध में वास्तविक कमी लाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

Vivek Tripathi
PhD. Research Scholar, Department Of Geography, University Of Delhi, Delhi, INDIA

4 thoughts on “भारत में अपराध | एक ज्वलंत समस्या”

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