सुप्रीम कोर्ट को तो भारत मे मूर्तिपूजा बन्द कर देनी चाहिये और इसे अपराध घोषित कर देना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट को तो भारत मे मूर्तिपूजा ही बन्द कर देनी चाहिये

 

“सुप्रीमकोर्ट और सरकार को या तो मूर्तिपूजा पर प्रतिबंध लगाकर दण्डनीय अपराध घोषित कर देना चाहिए… अन्यथा मूर्तिपूजा और मन्दिर के बारे में कोई निर्णय निष्पक्ष बुद्धि लगाकर देना चाहिए… ईसाइयत में जीसस गॉड के पुत्र हैं, और चर्च गॉड का सिर्फ़ प्रार्थना-स्थल है… इस्लाम में मुहम्मद अल्लाह के भेजे दूत (पैग़म्बर) हैं, तथा मस्ज़िद अल्लाह का प्रार्थना-स्थल है… गॉड और अल्लाह का कोई घर अथवा स्थल धरती पर नहीं है क्योंकि मान्यतानुसार वह सिर्फ़ निराकार है… परन्तु सनातन धर्म में निराकार ईश्वर भी आवश्यकता पड़ने पर साकार रूपों में स्वयं धरती पर अवतार लेता रहा है… साकार रूप में ईश्वर की पूजा होने के कारण मन्दिर सिर्फ़ प्रार्थना-स्थल ही नहीं है, अपितु उसे देवालय भी कहा जाता है, अर्थात देवता का घर… किसी ख़ास देवता या देवताओं के मन्दिर में उनकी मूर्तियों अथवा विग्रह की अनुष्ठानपूर्वक प्राणप्रतिष्ठा की जाती है… किसी मन्दिर में प्राणप्रतिष्ठा की हुई मूर्ति को सजीव मानकर उससे जीवित मनुष्यों की ही तरह व्यवहार और सम्मान किया जाता है… मूर्ति को हरदिन नहलाया जाता है, वस्त्राभूषण पहनाए जाते हैं, श्रृंगार किया जाता है और खाद्य सामग्री का भोग लगाया जाता है…

 

और जब कोई देवालय देवता का निवास है तो ख़ास मन्दिर विशेष के देवता विशेष के समस्त विधि-नियम उस मन्दिर में लागू होते हैं… उस देवालय में प्राणप्रतिष्ठित देवता के अनुसार ही उसकी पूजा-अर्चना होती है, भोग लगता और वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं… हरेक मंदिर और हरेक देवता की आराधनाएं, पूजा-अर्चना, भोग, चढ़ावा और प्रसाद अलग अलग होते हैं… यदि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं तो उनकी पूजन विधि अलग तरह की होगी लेकिन रामसीता की पूजन विधि उससे अलग होगी… शिव की पूजन विधि विष्णु से भिन्न होगी… सीकर के बालाजी जाने वाले लोग लौटकर एक महीने तक लहसुन प्याज़ नहीं खाते… यदि सबरीमाला देवालय के अधिपति भगवान अय्यप्पा रजस्वला स्त्रियों से परहेज़ करते हैं तो वहाँ कोई रजस्वला महिला जबरन क्यूँ जाना चाहती है…? किसी से मिलने यदि हम स्वेच्छा से उसके घर जाते हैं तो हम उसके घर के नियम मानेंगे, या फ़िर उसके घर में घुसकर अपने नियम उस पर जबरन थोपेंगे…? सुप्रीमकोर्ट के कोर्टरूम में जाकर हम वहाँ के नियम मानेंगे या अपनी मनमर्जी से आचरण करेंगे…? दुनियां के किसी वेतनभोगी न्यायालय को धार्मिक आस्थाओं-मान्यताओं की व्याख्या अथवा वैज्ञानिक परीक्षण करने का न तो अधिकार है और न ही उनकी हैसियत…

सच तो यह है कि भगवान अय्यप्पा की भक्त महिलाएं स्वयं सड़कों पर उतर कर सुप्रीमकोर्ट की इस नाहक़ दख़लंदाजी का भारी विरोध कर रही हैं… जबकि स्त्रीप्रवेश को मुद्दा बनाकर वाद-विवाद करने वाला वही वामी नारी-विमर्शक गिरोह है, जो बेवज़ह दो-चार ताड़काओं और शूर्पणखाओं के जरिये साज़िशन इस तरह के विवाद अक़्सर उठाता रहता है… यह भी याद करिये कि तीन तलाक़ के मुक़दमे के दौरान इसी सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि “तीन तलाक़ मामले पर हमें सिर्फ़ इतना देखना है कि तीन तलाक़ इस्लाम मज़हब का अंग है या नहीं”… वही सुप्रीमकोर्ट सबरीमाला मंदिर पर फ़ैसला देते समय इस बात की उपेक्षा करता है कि किसी देवालय के रीतिरिवाज़ उस देवता के धर्मगत और शास्त्रोक्त नियमों का ही हिस्सा होते हैं… इस तरह तो कल को सुप्रीमकोर्ट शिवलिंग को अश्लील बता सकता है और पूजन-सामग्रियों और पूजन-विधियों का भी नियमन कर सकता है… दरअसल ग़रीब की लुगाई की ही तरह हिन्दू धर्म अनाथों का धर्म है, जिसका कोई संरक्षक नहीं है, ठेकेदार अनगिनत हैं… जांच करिये तो पाएंगे कि ये मुक़दमेबाज़ नास्तिक औरतें न कभी किसी मंदिर जाती होंगी और न इन्हें कभी शबरीमाला या शनिमंदिर जाना है… वैसे भी सनातन धर्म में दुनियाँ के दूसरे मज़हबों की तरह नियमित रूप से मंदिर या देवालय हरेक का जाना आवश्यक नहीं होता… यदि मुक़दमेबाज़ औरतों को महज़ शोहरत के लिए खखेड़ न करनी हो, तो एक शबरीमाला मंदिर को छोड़कर भारत में हज़ारों मंदिर हैं जहाँ वो अपनी आस्थानुसार रोज़ जा सकती हैं… उधर कोलेजियम में सरकार के दख़ल पर आपत्ति करने वाला और कोर्टरूम में आचरण के अनगिनत अनुशासन थोपने वाला सुप्रीमकोर्ट स्वयं भगवान के घर के अंदर के आचरण के नियम तय कर रहा है…

 

क्या सुप्रीमकोर्ट में बूता है निर्णय देने का कि अब जामामस्जिद में मर्द और औरतें एक ही ज़मात में नमाज़ पढ़ें… कि अब किसी भी मस्जिद की इमाम अथवा मुतवल्ली महिला भी बने… कि इस्लाम में मूर्तिपूजा निषेध है, इसलिए दरगाहों में चादर और प्रसाद चढ़ाने पर प्रतिबंध लगेगा… कि अब महिलाएं भी निर्वस्त्र दिगम्बर जैन मुनि बन सकती हैं… कि अब महिलाएं भी बौद्ध भंते का स्थान ले सकती हैं… कि अब गुरुद्वारों में ग्रंथी और मुख्यग्रंथी महिलाएं भी बन सकेंगीं… कि चर्च की फ़ादर, बिशप और पोप की जगह अब महिलाएं भी नियुक्त हो सकती हैं… कि कम्युनिस्ट पार्टी के पॉलित ब्यूरो की मुखिया अब कोई महिला भी हो सकती है… कि दारूखानों, मयखानों में घुसने से परहेज़ करने वाली महिलाओं को वहाँ पुलिस सुरक्षा दी जाएगी… और जब देवालय में कोई भेदभाव का नियम नहीं लागू हो सकता, तो अदालतों और सुप्रीमकोर्ट के कोर्टरूम में तमाम अदब-अनुशासन के नियम भी निरस्त किये जायें… दरअसल अतिशय ज्ञान पागलपन के बहुत क़रीब होता है… परमज्ञानी और पागल में एक बाल के बराबर ही फ़र्क रह जाता है… और फ़िर जब चमन में लक्ष्मीवाहन हर शाख पे बैठे हों तो क्या विधायिका, क्या कार्यपालिका, क्या न्यायपालिका, क्या मीडिया, क्या नेता, क्या जनता…

गूंगी जनता, बहरी सरकार, अंधा न्याय ;
कूढ़मगज़ टटोल रहे, को गदही को गाय।”

यह लेख युगल किशोर जी द्वारा लिखा गया है

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