अबोध बेटी गोद में,ताक रही है किसको,
तात की विवशता का,ज्ञान नहीं है उसको।
बालक कठिनता से ही, किरणों को भी रोके,
बालसुलभ आशाओं को,खिलने से ही टोके।
तन मन में बच्चों के जब,मिट्टी ही लिपटी है,
देखे तात आज भी कैसे,भारत माँ सिमटी है।
माँ की बेबस आँखें भी,पूछती धरा से जैसे,
तेरे रहते वंचित हुये,हम वस्त्र अन्न से कैसे।
पिता का दायित्व देखो,बँध गया सलाखों में,
बेकारी का कष्ट झेलता,रहा चारदीवारी में।
निर्धनता का जीवन,कैसा जीवन व्यापन,
निरीह तकती ये आँखें, ढूँढ रहीं हैं जीवन।
अन्नपूर्णा कुबेर भी,कभी कृपा दृष्टि बरसायेंगे,
या फिर रवि को त्याग,तम में ही समा जायेंगे।
कभी कोई सत्य नेत्र,मूल आवश्यकता जाने,
वचनों को ना परोसे,हरे दरिद्रता तब माने।
क्या कभी मनुष्यों को,दीनता का भान होगा,
बनें सहायक दीन के, ये अभिमान  होगा।

स्वरचित
रचना उनियाल
बंगलुरु

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