उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?

ये पंक्तियाँ किसी कवि, शायर या साहित्यकार के द्वारा नहीं लिखी गई, वरन् ऐसे क्रांतिकारी के द्वारा लिखी गई हैं, जिसने कौतूहल सी मचा दी थी अंग्रेजों में, भयभीत कर अंदर से झकझोर दिया था उन्हें, कानों में बम के धमाके गूंजवा दिये थे, पैरों तले जमीन खिसकवा दी थी। जी, सही पहचाना आपने,  भगत सिंह, भारत के लाल की हीं बात हो रही है। इन पंक्तियों को देखकर ही आप अंदाजा लगा सकते हैं, कितनी गरम खून रही होगी उस शूरवीर की।

28 सितंबर,1907 का वो पावन दिन, पुत्र पैदा हुआ था उस जाट सिख दंपति को, उनका पुत्र कहिए या कह लिजिए भारत माता का पुत्र, किया उन्होंने दोनों का नाम रौशन। बड़े ही निर्भीक थे बचपन से ही वो, और कहते हैं ना बड़ा हो कर बच्चा क्या करेगा, इख्लास उसके बचपन से ही लगाया जा सकता है। खैर बड़ा होने कहांँ दिया अंग्रेजों ने, पर जब तक रहे, बड़े ही शान से, खुद्दारी से रहे।

अभी बचपना खत्म भी नहीं हुआ था कि जलियांवाला बाग हत्याकांड हो गया और इसका ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ नौजवान भारत सभा की स्थापना की। फिर ऐसे हालात आए कि उद्विग्न होकर पंडित चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में अपना आह्वान किया। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन  में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके, और साहस देखें वहाँ से भागने की बजाए वहीं दोनों ने अपनी गिरफ्तारी दे दी।

दो साल जेल में व्यतीत कर, आखिरकार वो मनहूस दिन आया, 23 मार्च, 1931, शाम का 7 बजकर 33 मिनट, जब अंग्रेजों ने निर्ममता के  साथ, उनके साथ उनके मित्र सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा दी। और पुष्टता देखें उनकी, फांसी होने जा रही है और सब एक सूर में गा रहे हैं  –

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।

खुशी की बात यह है कि, बलिदान खाली नहीं गई, 15 अगस्त, 1947 को भारत आज़ाद हो गया।

लेकिन क्या वाकई में भारत आज़ाद हुआ ?
क्या वाकई में भारत वही है, जिसका सपना शहीद भगत सिंह जी ने देखा था ?
क्या वाकई में भारत वही है, जिसकी कल्पना कर उन्होंने अपना बलिदान दिया ?

बिल्कुल नहीं ।

उनका सपना था कि इस देश में सब एक समान हो, कोई जात छोटा नहीं, कोई जात बड़ा नहीं, सब बराबर हों। कोई एक दूसरो पर धर्म के नाम पर लांछन ना लगाए। पर ऐसा अमल तो हो नहीं पाया।

उनका सपना था कि भारत के कमजोर वर्ग पर कोई प्रहार ना करें। पूंजीपति गरीबों का उत्पीड़न ना करें। सब एक समान एक दूसरे की सहायता करते रहें और मिलजुल कर रहें। पर ऐसा अमल तो हो नहीं पाया।

उनका सपना था कि देश के युवा, पूर्ण रूप से पढ़ाई कर देश की स्थिति में सुधार करें और अपना जीवन देश की उक्ता काठ में समर्पित करें। देश की अर्थव्यवस्था को सुधारें। पर ऐसा अमल तो हो नहीं पाया।

उनका सपना था कि देश में भ्रष्टाचार बस किताब के पन्नों पर रह जाए। सारे नेता बिना किसी स्वार्थ के जनता के हित में काम करें। हमारी इमानदारी के किस्से सारे विश्व में प्रचलित हो। पर ऐसा अमल तो हो नहीं पाया।

उनका सपना था कि हमारा देश पूरे विश्व में किसी से किसी भी क्षेत्र में परास्त ना हो, हर जगह अव्वल रहे। वाह वाही चारों तरफ अपना पांव पसारे हो। पर ऐसा अमल तो हो नहीं पाया।

आप सोचें ? अगर आज वो जिंदा होते तो क्या हमारी स्थिति देख प्रसन्न होते ?

क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि उनके बलिदान को व्यर्थ ना जाने दे ?

आएं, आज ही प्रण लें, कि हमारा हर कदम निःस्वार्थ रहेगा , राष्ट्र हित में समर्पित रहेगा और हर ओर अमन और चैन बनाने के लिए लिप्त रहेगा ।

आगे मैं चंद पंक्तियाँ उस महापुरुष के लिए समर्पित करता हूँ  –

भारत माँ का वीर पूत वह
बड़ा ही बहादुर था,
अपनी माँ को बंदिशों से
छुड़ाने को वो आतुर था ।

बम गिरा असेंबली में
मचा दी उन्होंने खलबली,
इंकलाब के नारे लगा
खून खौलाई गली गली।

हुआ जेल उस जांबाज को
चेहरे पर सिकन ना आई,
फांसी चढ़ा दुष्ट अंग्रेजों ने
जरा भी दया ना दिखाई।

पावन धरती का सूत था वो
देश के लिए हुआ बलिदान,
ऐसे वीर हिंद के लाल को
पूरे भारत का प्रणाम ।

हाँ, दी उस वीर ने अपनी बली
भारतवर्ष को आज़ाद कराया,
पर क्या यह, वह भारतवर्ष है
जिसके लिए अपना प्राण गंवाया ।

पूंजीपतियों को शत्रु बताया था,
पर आज भी देश को लूट रहे,
जाती, धर्म को घुन बताया था,
पर आज भी देश को टूट रहे ।

मजदूरों के शोषण के थे वो सख्त खिलाफ
पर आज भी कमज़ोरों को मिलता नहीं इंसाफ,
ख्याति बड़ी बड़ी लिए लोग आज भी राज करते हैं
क्या कानून, क्या कोर्ट, भगवान से भी नहीं वो डरते हैं।

भ्रष्टाचार ने पांव पसार
चारों पर भी वर्चस्व जमाया है,
भगत सिंह के सपनों पर
क्या खूब अमल कर दिखलाया है ।

जिस भारत के सपने देख, दिया उन्होंने कुर्बानी,
कब दिखेगी ऐसी भारत ओ भारत के प्राणी ?

जय हिंद ! जय भारत ! जय भगत सिंह !

पुरूषोत्तम नारायण 
(puru12101699) 

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