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.. *कहता है*
घर आजा परदेशी अब
कोना कोना कहता है
इस घर के हर हिस्से में
याद बनकर रहता है
दीया तकता राह तुम्हारी
सूना है आँगन,कहता है
खेली थी आँखमिचौली
उदास वो पेड़ रहता है
बन के ख्बाव इन आँखों में
हर पल तेराचेहरा रहता है
पाखी भी घर लौट चले
ढ़लता सूरज कहता है
पाखी जैन
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