गजब के नैन नख शिख हैं,गजब की लुनाई है ।
समझने में नहीं धोखा, मगर आफत बुलाई है ।

उमर सोलह सरक करके, लटे आँचल उड़ाती है,
पिता को हो गई चिंता,कि करनी अब सगाई है।

हमें उनके सधे तेवर, बड़े आबाद लगते हैं ,
उन्होंने असल में क़ुर्बानिए इच्छा जगाई है ।

नहीं है याद मुझको तो ,कभी थोड़ी सी भी पी हो,
नजर से नजर जब मिलती,लगे बिन पी पिलाई है।

मनन करना है खरी आदत,सुबह शाम हम करते,
मगर चिंता बदलती भाव सब,दुनिया मिटाई है।

सतत हम पर छिड़कती जान,जाने मीत क्यों रूठी ,
जगत की घात ने ‘हितैषी’,दुखती रग दबाई है।

 

प्रबोध मिश्र ‘ हितैषी ‘

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