जब मेरी मौत का फैसला कर दिया
की इबादत तुझे फिर ख़ुदा कर दिया

तेरे हाथों से पीकर भी जिंदा हूँ मैं
तूने छूकर ज़हर को दवा कर दिया

इश्क हो या इबादत इरादत ने ही
पत्थरों को यहाँ देवता कर दिया

और कोई नहीं है मुकाबिल तेरे
या खुदा आंधियों को हवा कर दिया

भूल जाना न जर की चमक में ये सच
वक़्त ने कब किसे क्या से क्या कर दिया

आज रोते हो क्यूँ मौत को देखकर
अब तलक जिंदगी थी तो क्या कर दिया

इक हँसी पे तेरी जान देते थे जो
दूर जाकर उन्हें ग़मज़दा कर दिया

जब कहा मुझसे वैभव करो जागरण
पांव माँ के छुए रतजगा कर दिया

वैभव दुबे
#स्वरचित#

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