गलतियों की कोई गुंजाईश नहीं

इश्क में हद से ज्यदा नुमाइश नहीं |

मातम में रहा इस कदर एक शहर

अब किसी की फरमाइश नहीं|

एक गुज़ारिश है आँखों से ओझल रहो

फिर हमारी भी कोई गुज़ारिश नहीं |

चाँद सूरज तुम्हरे इशारों पे हो

फिर भी तुमसे हमारी कोई सिफारिश नहीं |

हमको खुदको लगी थी  तबाही की लत

सामने तो किसी की भी साज़िश नहीं |

IKRA NAZMA KHAN

3 thoughts on “किसी की भी फ़रमाइश नहीं…”

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