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न जाने जमाने को क्या हो रहा है।
हरिक आदमी खुद खुदा हो रहा है।।

जमी धूल रिश्तों की चादर पे ऐसी ।
दिलों में कहीं फासला हो रहा है।।

न जुगनू चमकते कहीं आस के हैं ।
गमों का तिमिर भी घना हो रहा है।।

मेरे आंसुओं को न पानी समझना ।
मेरा कोई मुझसे जुदा हो रहा है।।

न रिश्तों की कोई रही अहमियत अब।
यहाँ सिर्फ़ पैसा सगा हो रहा है।।

जिसे रास आने लगी है सियासत ।
वतन में उसी का भला हो रहा है।।

नहीं “दीप” करना मुहब्बत किसी से।
मुहब्बत में भी अब दगा हो रहा है।।

(स्वरचित )
प्रदीप कुमार

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