प्रेम की बारिशों में झुमकर देखियेगा ,
प्रेमपत्रों के शब्द चुमकर देखियेगा,
वर्णन का आधार मिल जायेगा,
दिल सच्चा है तो प्यार मिल जायेगा!
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                 📝©
:-मनीष कुमार झा”मणिभूषण”
E-Mail-Manibhushan.Jha31@Gmail.Com
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“प्यार” ढ़ाई अक्षर का एक ऐसा शब्द जो संयोजित रूप से भले ही अधूरा हो पर इसका शाब्दिक व भावनात्मक रूप असीमित व परिपूर्ण हैं। प्यार एक ऐसी भावना हैं जिसका हर किसी को जीवन पर्यंत इंतज़ार रहता हैं। जो खुशनसीब होते हैं।उन्हें सच्चा प्यार मिल जाता हैं और जो धैर्यवान होते हैं वो इसका इंतजार करते हैं।
यदि हम जीवन के मूल में देखें तो उसका एक मात्र लक्ष्य है खुशी हासिल करना। हमें उपलब्धियों, जीवन की सफलताओं और अनेक प्रकार के आयोजनों से आनंद मिलता है। पर, सच्ची एवं संपूर्ण खुशी हमें तब मिलती है जब हम किसी को प्यार करते हैं या कोई हमें प्यार करता है। हमारे मन को इससे ज्यादा संतुष्टि व सुकून किसी और प्रकार की खुशी से नहीं मिलती है।
मोहब्बत एक एहसास है, जिसे रूह से महसूस किया जा सकता है। यह उस अनादि अनंत ईश्वर की तरह है, जो सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। प्यार, जो हमारे संपूर्ण जीवन में विभिन्न रूपों में सामने आता है। जो यह एहसास दिलाता है कि जिन्दगी कितनी खूबसूरत है!!प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है!!प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ सृष्टि में जो कुछ सुकून भरा है, प्रेम है। प्रेम ही है, जो संबंधों को जीवित रखता है। परिवार के प्रति प्रेम, जिम्मेदारी सिखाता है।
प्रेम हृदय का निश्छल व्यापार है। सर्वात्म भाव से किसी को आत्मसमर्पण कर देने में असीम सुख प्राप्त होता है!!प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है। वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है।’ सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है। प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती। वास्तव में प्रेम के पथ में प्रेमी और प्रिय दो नहीं, एक हुआ करते हैं। एक की खुशी दूसरे की आंखों में छलकती है और किसी के दुःख से किसी की आँख भर आती है।
प्रेम इंसान को विनम्र बना देता है। रूखे से रूखे और क्रूर से क्रूर इंसान के मन में यदि किसी के प्रति प्रेम की भावना जन्म ले लेती है, तो संपूर्ण प्राणी जगत के लिए वह विनम्र हो जाता है। ऐसे कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मिलते हैं। प्रेम चाहे व्यक्ति विशेष के प्रति हो या ईश्वर के प्रति। आश्चर्यजनक रूप से उसकी सोच, उसका व्यवहार, उसकी वाणी सबकुछ परिवर्तित हो जाता है। प्यार, जिन्दगी का सबसे हसीन जज्बा है। बोलने में यह जितना मीठा है, उसका एहसास उतना ही खूबसूरत और प्यारा है। प्यार के एहसास को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। उसे व्यक्त करने की आवश्यकता भी नहीं होती। व्यक्ति की आँखें, चेहरा, हाव-भाव यहाँ तक कि उसकी साँसें दिल का सब भेद खोल देती हैं। प्रेम की अनोखी दुनिया में खोकर कोई बाहर आना ही नहीं चाहता। वह जिसे प्यार करता है, खुली आँखों से भी उसी के सपने देखता है। उसके साथ बिताई घड़ियों को बार-बार याद करता है। उसके लिए सजना-सँवरना चाहता है। यही नहीं, औरों से बात करते हुए भी उसी का जिक्र चाहता है। यही प्यार का दीवानापन है और इस दीवानेपन में जो आनंद है, वह संसार की किसी भौतिकता में नहीं है।
आज की तेज रफ्तार से दौड़ती जिन्दगी में व्यक्ति जब एक-दूसरे को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ने की होड़ में संवेदनाओं को खोता चला जा रहा है, रिश्तों और एहसासों से दूर, संपन्नता में क्षणिक सुख खोजने के प्रयास में लगा रहता है, ऐसी स्थिति में जहाँ प्यार बैंक-बैलेंस और स्थायित्व देखकर किया जाता है, वहाँ सच्ची मोहब्बत, पहली नजर का प्यार और प्यार में पागलपन जैसी बातें बेमानी लगती हैं परंतु प्रेम शाश्वत है। प्रेम सोच-समझकर की जाने वाली चीज नहीं है। कोई कितना भी सोचे, यदि उसे सच्चा प्रेम हो गया तो उसके लिए दुनिया की हर चीज गौण हो जाती है। प्रेम की अनुभूति विलक्षण है। प्यार कब हो जाता है, पता ही नहीं चलता। इसका एहसास तो तब होता है, जब मन सदैव किसी का सामीप्य चाहने लगता है। उसकी मुस्कुराहट पर खिल उठता है। उसके दर्द से तड़पने लगता है। उस पर सर्वस्व समर्पित करना चाहता है, बिना किसी प्रतिदान की आशा के।
प्यार और दर्द में गहरा रिश्ता है। जिस दिल में दर्द ना हो, वहाँ प्यार का एहसास भी नहीं होता। किसी के दूर जाने पर जो खालीपन लगता है, जो टीस दिल में उठती है, वही तो प्यार का दर्द है। इसी दर्द के कारण प्रेमी हृदय कितनी ही कृतियों की रचना करता है। प्रेम को लेकर जो साहित्य रचा गया है, उसमें देखा जा सकता है कि जहां विरह का उल्लेख होता है, वह साहित्य मन को छू लेता है। उसकी भाषा स्वतः ही मीठी हो जाती है, काव्यात्मक हो जाती है। मर्मस्पर्शी होकर सीधे दिल पर लगती है।
प्यार वह अनुभूति है, जिससे मन-मस्तिष्क में कोमल भावनाएँ जागती हैं, नई ऊर्जा मिलती है व जीवन में मीठी यादों की ताजगी का समावेश हो जाता है।
यहाँ अपने शब्दों को सीमांकन करते हुवे मैं सिर्फ एक तथ्यों को स्पष्ट करुंगा कि प्रेम का निर्वाह करने के लिये हमें अपने परिवारिक संस्कार समाजिक संस्कार , परिवारिक प्रतिष्ठा ,समाजिक प्रतिष्ठा तथा स्वयं जीवन के सभी सकारात्मकताओं के संग हमें प्रेम की दुनिया में प्रवेश लेनी चाहिये और सदैव एक-दूसरे की भावनाओं को समझना चाहिये ,एक-दूसरे को यह अनुभूति करवाना चाहिये  कि ‘आप हैं, आपका अर्थ है, आपका  अस्तित्व है और हमेशा रहेगा।’
जिससे सभी अर्थों में जिंदगी की सार्थकता महसुस हो ………..!!!!
शुक्रिया……………… ©मनीष

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