दुर्गा जब भी तू ताजमहल की दीवार के सामने से गुजरती है रुक जाती है,तुझे सर पर बोझ नही लगता।
हम मजदूर है हमें क्या इस इमारत से लेना देना दिहाड़ी लेकर घर लौट जाना है।

मुस्काते हुए दुर्गा ने कहा,”काकी में कुछ पल रुक कर सोचती हूँ कि मेरे सर की “तगारी” का बोझ ज्यादा है या इस ताज के नीचे कब्र में दफन मुमताज की छाती पर बने इस प्रेम महल यानी कि ताजमहल का वजन ज्यादा है।
बस बजन का अंदाजा लगाने को कुछ पल रुकती हुँ।

पागल हो गई तू दुर्गा बहकी बहकी बातें करती है लगता है रात में जो तू मास्टरनी जी के पास जो किताब पट्टी लेकर पढ़ने जाती है न वही तेरा दिमाग खराब करती है

अरे हम मजदूरी करते आये है और ऐसे ही उमर गुजर जाएगी हमारा आदमी एक झोपड़ीं बना के नही दे सकता ,तू ताजमहल का बजन तोल रही,पगली कहीं की।

हां तो काकी यही तो कह रहीं हुँ की मरकर भी छाती पर बोझ लादकर रहो इससे अच्छा तो न बनें हमारा कोई महल हम अपने झोपड़ें में सुखी है।

” प्रेम के प्रतीक की इतनी गहराई पूर्ण व्याख्या “शायद रात्रिकालीन कक्षा की टीचर भले समझ जाएं

काकी तो पगली कहकर अपनी तगारी का बोझ लिए आगे बढ़ गई।

कुसुम शर्मा (नीमच)

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