तेरी गठरी में लागा चोर
मुसाफिर जाग जरा ………………
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वर्ष 2018-19 का बजट 2 फरवरी को प्रस्तुत किया गया था,उस दिन बजट को गौर से नहीं देख सका था ,आज मैनें बजट के संपूर्ण तथ्यों का अवलोकन अच्छे से किया है!बजट देखने के बाद मुझे सकारात्मकता भी दिखाई दिया और कुछ नकारात्मकता भी !मैं आर्थिक जगत के महान स्तंभों की तरह व्यापक स्तर पर इसका विश्लेषण तो नहीं कर सकता हूँ, लेकिन इसके संदर्भ में अपनी कुछ अभिव्यक्ति अपनी ब्लॉगलेखन के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूँ!
©मनीष कुमार झा”मणिभूषण”
E-Mail-Manibhushan.Jha31@Gmail.com
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यह जरुरी नहीं कि हर फल में गूदा हो!हमारे भाग्य में तो गुठली ही लिखी है !यह बजट तो हुजूर वह नदी है जिसमें न लुटिया पूरी डूबी और न ही पूरी भरी!इसने बता दिया कि चुनाव जैसे संकट लगन देखकर नहीं आते !

अरे भैया जी ,मँहगाई तो वह लैला है जिसके पीछे मंजनू हमेशा भत्ते की तरह लगा रहता है !चाहे जो अफरा -तफरी हो, आखिरकार यदि नौ मन तेल हो ,तो सरकारी राधिका भी टेढ़े आँगन में नाच ही लेती है!यूँ भी बजट का टेढ़ापन उसकी बांकी अदा मानी जाती है !हमारे यहाँ तो इस मादक मौसम में नचैये -गवैये भी काठ की तोप चलाने लगते हैं !सरकार तो वड़े वड़ो की पतंग काट ही लेती है!
जनता के भाग्य में तो सिर्फ चऱखी पकड़ना लिखा है ,जिसको चाहे जितना घस लो ,सिलबट्टे की भांग कभी नहीं चढ़ती !

यह भी सच है कि हूजूर कि बजट के दिनों में अगर दीन और ईमान मँहगे न हो तो कोई भी समाज तरक्की नहीं कर सकता! जो ललाट पर लिखा था ,वह तो बजट में नमुदार हो ही गया !अब बजट के आलोचकों को यह कौन बताये कि लकीर पीटने से साँप नहीं मरता !अलादीन के चिराग से लगता है कि मरा हुवा जिन्न निकल कर बाहर आ गया है !!
जिन सरकारी कर्मचारियों के चेहरे कुछ दिन पहले वसंत पंचमी के दिन हरे -भरे थे ,वे पीले रंग में रुपान्तरित हो गये हैं लगता है जैसे,जॉन्डिस हो गयी है ………!!

यह बात तो सर्वविदित है कि बिना हरी दूब के गोबर गणेश भी शोभा नहीं देते हैं!अब अगर अच्छे दिन आते हैं और यदि आप अपनी दरबाजे के कुंडी़ नहीं खोलते हैं तो देख लिजियेगा वे आपका दरबाजा तोड़ देंगे !और
कहा भी कहा गया है कि ………”तेरी गठरी में लागा चोर , मुसाफिर जाग जरा ” और जागते ही इस साल के बाद अगले साल होने वाले चुनावों के लिये वोट की लाईन में लग जा!!!…………….

(बजट (2018-19)
के संदर्भ में अपने शब्दसंयोजन में अभिव्यक्त मेरा ब्लॉग)
शुक्रिया…©मनीष

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